Tuesday, 5 November 2013

समानता की बातें भाषणबाजी के वक़्त अच्छी लगती है बोलने में और सुनने में ---

हम समाज के पिछड़े हुए लोगों को चाहे जितना ठुकरायें , पर हमें भी उनकी ज़रूरत रहती ही है और कभी-कभी तो वे लोग हम सभ्य समाज के लोगो से कई गुना ज़्यादा सभ्य और प्रतिभावान साबित होते हैं |  मैं खुद एक छोटे शहर की रहने वाली हूँ लेकिन कई कारणों से हमेशा ही मैं बड़े शहर , छोटे शहर या गाँव हर तरह के इलाकों से जुड़ी रहती हूँ | समाज के पिछड़े हुए लोगों को मैंने बहुत करीब से देखा है , वे आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं इसके लिए कुछ तो जिम्मेदार यहाँ की सरकार है और कुछ हम हैं | सरकार हमेशा ही उन लोगों को एक ओर अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है तो दूसरी ओर दमननीति का भी इस्तेमाल करती है और हम उन सबको उपेक्षा की नज़र से देखते हैं | उन लोगों को हम अपने सामने बहुत ही छोटा समझते हैं | उन लोगों को कभी भी उनका अधिकार नहीं देते हैं | मैंने कई दफा देखा है उन लोगों के बच्चों में नई चीज़ें जानने की बहुत ज़्यादा ललक होती है | इस ललक का अभाव मैंने बहुत अच्छे अच्छे शहरी विद्यालय की छात्र/छात्रा में पाया है | पता नहीं इसका कारण क्या है शायद ज़्यादा दमित हुए हैं ये लोग इसलिए जब कुछ जानने का मौका इन लोगों को मिलता है तब ये लोग उस चीज़ पर अपना पूरा ध्यान लगाते हैं और सबसे आगे जाने की एक ज़िद्द पकड़ लेते हैं अपने आपको साबित करने के लिए | हम खुद को कहते है कि  हैम वक़्त के साथ साथ हम आगे बढ़ गए हैं और अपनी  सोच को भी बहुत बड़ा कर लिया है | लेकिन वास्तविकता यह है हम ज़्यादा नहीं सुधरे बस समाज के सामने महान बनने का ढोंग मात्र करते हैं घर जाते जाते अपने असलियत पर उतर आते हैं | समानता की बातें भाषणबाजी के वक़्त अच्छी लगती है बोलने में और सुनने में -- पर वास्तविकता क्या है , यह हम सबको खुद ही पता है | हाँ , ऐसे लोग भी हैं जो समाज के लिए सच्चे मन से कार्य करते हैं और करना चाहते हैं लेकिन समाज के कुछ गिने चुने सभ्य और नेता जैसे लोग उन लोगों का हमेशा ही दमन करते रहते हैं और उन्हें आगे नहीं बढ़ने देते |

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