Tuesday, 22 October 2013

सिर्फ अपनी मनोरंजन के लिए हम किसी के भावनाओं के साथ खेलते है ---

कल मैं अपने एक मित्र से आजकल के रिश्ते को ले कर चर्चा कर रही थी या फिर जिसके साथ ही इस संबंध में बातें होती है ज़्यादातर इंसान अपनी निजी रिश्ते में आज़ादी चाहता है | काफी हद तक यह सही भी है अपना अपना जीवन है हर कोई अपने ढंग से जीना चाहता है | मैंने यह भी देखा जो लोग बहुत ज़्यादा नैतिक बने रहने की दिखावा करते है अपने रिश्ते को ले कर वो बस दिखावा मात्र ही है | असल बात कुछ ओर ही होता है क्योंकि वास्तव जीवन अलग है |

मैं जब भी किसी शादीशुदा पुरुष या स्त्री से बात करती हूँ उनमें ज़्यादातर लोग यही कहते है – “मेरी बीवी मुझे नहीं समझती और मेरे पति मुझे नहीं समझता इसलिए हम अपने लिए नए नए रिश्ते ढूंढ रहे है जहां हमे ऐसा कोई मिले जो हमे दो पल का सुकून दे” | लेकिन यहाँ पर एक बात यह है हम जीतनी म्हणत हम दूसरे रिश्ते जोड़ने में करते है वही अगर हम अपने जायज रिश्ते को बचाने में करे तो कई घर टूटने से बच सकता है | खैर यह अपनी अपनी नीच सोच है | और किसी को यह बर्दाश्त भी नहीं होता है कि उनके निजी जीवन और रिश्ते में कोई कुछ बात करें |


और लड़का/लड़की की बात करें तो अपने जीवन में प्यार सभी को चाहिए वचनबद्धता भी चाहिए लेकिन रिश्ते को नाम ज़्यादातर इंसान नहीं देना चाहते सभी आज़ाद रह कर जीवन जीना चाहते है | अक्सर देखा गया है आजकल के ज़्यादातर प्यार-महुब्बत के रिश्ते में अगर लड़का या लड़की ज़्यादा गंभीर हो गया तो वो रिश्ता टूट जाता है क्योंकि सामनेवाला/सामनेवाली उसके प्रेमी/प्रेमिका की गंभीरता को देख कर डर जाते है | क्योंकि कहीं ना कहीं उन्हें डर है कि उनकी आज़ादी छिनने वाली है | और जब शादी की  बात आती है प्यार के रिश्ते में सामनेवाला रिश्ते को तोड़ने के लिए तब माँ-बाप , भाई-बहन , अपना आसपड़ोस , अपनी विरादरी इन सबकी दुहाई सामने रखते है | लेकिन प्यार करते वक़्त यह सब याद नहीं रहता है ज़्यादातर इंसान को , बाद में याद आती है यह सब जब रिश्ता तोड़ने कि इच्छा होती है | सबसे बड़ी बात हम सबको पहले से ही सबकुछ पता रहती है लेकिन फिर भी हम उस राह पर चलते है | सिर्फ अपनी मनोरंजन के लिए हम किसी के भावनाओं के साथ खेलते है जो हमसे सच्चा प्यार करता है | दुनिया में जिस चीज़ की  चलन ज़्यादा होती है चाहे वो जायज हो या नाजायज आगे चल कर वही संस्कार बन जाती है हमारी | देखते देखते यह सब भी हमारा संस्कार ही बन जाएग  तब शायद किसी को वो दर्द ना महसूस होगा जो आज महसूस हो रहा है |

3 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति | सही बातें लिखी हैं आपने |

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  2. समन्वय की कमी मूल वजह रहती है !!

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  3. इंसानी फितरत है की वह गलत सही अपने हिसाब से बनाता है, अगर मेरा फायदा किसी गलत बात से है तो मैं अलग अलग तर्क से उसे सही बना दूँगा, लड़की लड़के शादीशुदा और कुवारे सभी को पता है सही गलत का पर किसी तीसरे से जुड़ने का उनका अपना तर्क है! कुछ तो अपने गलत को सही करने के लिए भगवान् का भी उदाहरण देते है, जैसे भगवान् कृष्ण, मेरा मानना है सही गलत वही है जो आपका विवेक कहता है।

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