Wednesday, 4 September 2013


अगर किसी को अपने ऊपर हो रहे ज़ुल्म ही सही लगता है, वो कभी भी उस ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठता/उठती है | तो उसके लाख़ समर्थक होने के बाद भी बेकार है, समर्थक कुछ नहीं कर सकते |



एक 28 साल की विवाहित महिला, एक बच्ची की माँ, उसको पति शराब पी कर पीटता है | सास-ससूर उस लड़की के साथ खड़े नहीं होते हैं | वो लोग उसके ऊपर ज़ुल्म होते हुए देखते रहते हैं | उस लड़की को अगर इसके खिलाफ़ प्रतिवाद करने के लिए बोला जाए, तो वो प्रतिवाद के खिलाफ़ है | उसके सामने उसके ससुराल और मायके की इज्ज़त आ जाती है | उसे लगता है, उसकी भी इज्ज़त जाएगी | ना तो किसी को वो अपने घरवालों को कुछ कहने देती है, ना ही ख़ुद कुछ बोलती है | क्योंकि, उसे डर है, उसका घर टूट जाएगा | मैं यह नहीं समझ पा रही हूँ, कि अभी भी कहाँ उसका घर जुड़ा हुआ है ! हम लोग समझाते-समझाते थक गए, मेरा एक पत्रकार दोस्त हमेशा उसके साथ खड़ा है | उस लड़की के लिए लड़ने तक को तैयार है |

लेकिन जब वो लड़की ही नहीं चाहती, तो हम सब कुछ नहीं कर सकते | किसी बच्चे के ऊपर ज़ुल्म होता, तो हम अपनी ज़िम्मेदारी से उस मुद्दे को सुलझा सकते थे, लेकिन एक 28 साल की लड़की जो अपनी जुबान नहीं खोलना चाहती, अपने ऊपर होते हुये ज़ुल्म के खिलाफ़, तो उसकी सहायता दुनियाँ का कोई भी व्यक्ति नहीं कर सकता, और स्वम् भगवान भी नहीं कर सकते |

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