Saturday, 27 April 2013

कुछ क्षण के उजाले में
यह मन भी
धोखा खा गया |

वो तो अंधेरे में एक पल का
बिजली का चमकना था |

पता नहीं यह मन
घने कोहरे में छिपी
कौन से धुंधले सपने के
पीछे भाग रहा है !

जानती हूँ , धोखा और भ्रम
यहाँ भी है |
फिर भी यह मन ,
कुछ पल की खुशी के
पीछे यूं ही भागता रहता है | - लिली कर्मकार

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