Thursday, 3 January 2013


ये रिश्ते भी अक्सर अजीब खेल खेलते है ...
जिसे अपना समझो अक्सर वही दूर जाते है ... !
 
भागती दौड़ती दुनिया में ....
पीछे मुड़कर देखने का वक़्त किस के पास है ... ?
 
न जाने कितने रिश्ते वक़्त के अंधेरे में खो गए ... !
न जाने किन किन मोड़ पर कितने रिश्ते टूट गए
सिर्फ थोड़े से अपनेपन के अभाव में .... !
 
लेकिन उन रिश्तों को समेटने का वक़्त किस के पास नहीं ... !
सभी वक़्त की मार से ...
इस दुनिया में एक जिंदा लाश बन कर जिये जा रहे है ... ! लिली कर्मकार 

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