Saturday, 1 September 2012


जिंदगी अपनी चाल चलती है .....

वो कितना नाचती है कितना घुमाती है ... ।

चलने दो चाले ......

बस बदलने दो जिंदगी का सिलसिला ... ।


गिरो उस बिजली की तरह .....

जिसे बादल के बरसने और .....

सुरज के चमकने का कारण बनता है .... ।

पहचान अपनी ऐसी हो की ......

कहीं भी खो जाओ .....

बन के नदी सागर में समा जाऊ ..... । – लिलि कर्मकार

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