Saturday, 1 September 2012

मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति और कमजोरी उसकी देह में स्थित मन है। कहना तो यह चाहिये कि मन की इच्छा से चलने वाला ही जीव मनुष्य कहलाता है। यह मन बहुत विचित्र है। पहले एक चीज को पाने का मोह करता है तो उसके आते ही उससे विरक्त होकर दूसरी का मुख देखने लगता . . . . . 

जैसे जैसे मनुष्य का अध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता जाता है वैसे वैसे उसे इस संसार के भोग विलास की वास्तविकता समझ में आती है। उपभोग की प्रवृत्ति किस तरह मनुष्य को पशु बनाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये इस संसार में बांधे रहती है इसका आभास तत्वज्ञानी . . . . . ! - नीति शतक

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