Saturday, 1 September 2012

हजारों साल के इतिहास पर नजर डालने से पता चलता है की अपने देश में ऋषि ….. साधुओ , योगियों , मनीषियों ने प्राचीन काल से ही धार्मिक समाज की परिकल्पना की ... लेकिन तब भी ये देश सदियों तक विदेशी आक्रमणकारियों बा आक्रान्ताओ से अपनी रक्षा में पूर्णता असमर्थ रहा ..... आखिर कही ना कही कोई कमी जरुर रह गयी ... कारण शायद ये रहा कि उन धार्मिक शिक्षाओ में भारतीय समाज को राष्ट्रधर्म के प्रति जाग्रत करने में जा
दा ध्यान नहीं दिया गया ( अपबादो को छोड़ कर ) … वर्ना ऐसा कैसे हो सक्ता था की हर बार कुछ हजार या कुछ सौ आक्रमणकारी आये और भारत की करोडो की जनसँख्या को पददलित कर सदियों तक यहाँ राज करने में समर्थ हुए .... धार्मिक संतो की आज की शिक्षाए भी समाज को स्वयं तक सीमित रक्खे है ... अपने परलोक की चिंता .. स्वर्ग में स्थान सुरक्षित रखने की अभिलाषा …. अपने जीवन की चिंता .... गुरु का गुणगान और धार्मिक भजनों की अधिकता .. स्वयं की संतुष्टि के लिये धार्मिक आचरण .. वीर रस की बजाये करुणा रस और भक्ति रस की अधिकता इन सब में राष्ट्रधर्म और राष्ट्र की चुनौतियों के प्रति चिंता कहीं नहीं दिखाई देती … । किसी भी धार्मिक संत या गुरु के आश्रम या समागम में जाने पर हर जगह भजन आरती ..स्वर्ग परलोक की चिंता .. कही कोई यह नहीं बताता की राष्ट्र को सुरक्षित और मजबूत कैसे बनाया जाए , क्या यही सच्चा धर्म है .... क्या इससे ही राष्ट्र रक्षा और धर्म रक्षा हो सकती है ...????

जब देश समस्याग्रस्त और असुरक्षित हो तो धर्म कितना सुरक्षित रह सक्ता है ….. समाज और देश की वर्तमान चिंताजनक परिस्थितियों में स्वामी रामदेव और आचार्य धर्मेन्द्र जैसे योगी और संत समाज में और क्यों नहीं दिखाई देते ..... क्या ये उचित नहीं की हम सबसे पहले राष्ट्र धर्म पर ध्यान दे .........!

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