Friday, 31 August 2012


एक व्यक्ति अपने अहं का दास बन जाता है जब वह व्यक्तिगत लाभों के विषय में सोचता है । एकस्वार्थी व्यक्ति सन्देह की स्थिति में वास करता है , क्योकि उसकी चेतना उसे निरंतर उसके गलत दृष्टिकोण (वृत्ति) का स्मरण कराती रहती है । एक तरफ वह अपनी स्वार्थी इच्छाओं द्वारा घसीटा जाता है एवं दूसरी तरफ वह अपनी आंतरिक आवाज के द्वारा सचेत किया जाता है । वह इन दो शक्तियों के मध्य टूटकर रह जाता है ।

किसी भी प्रकार से कभी भी अपनी निन्दा मत कीजिए । अपनी प्रशंसा एवं सराहना करना सीखिए , परंतु यह देखते रहिए कि आप अपने अहं का पोषण नहीं कर रहे हैं । साधना के मार्ग का यह एक धूर्त दुश्मन है , यद्यपि इसे कुछ प्रयासों के द्वारा ठीक किया जा सकता है ।

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