Friday, 31 August 2012

यात्रा तो अनंत की है : -

हर मृत्यु जन्म है और हर जन्म मृत्यु है। इस जगत में न तो कुछ समाप्त होता और न कुछ शुरू होता है। जिसे हम शुरूआत कहते हैं, वह किसी चीज की समाप्ति है। और जिसे हम समाप्ति कहते हैं, वह किसी चीज की शुरूआत है। जिसे हम सांझ कहते हैं, वह दिन का अंत है और रात का प्रारंभ है। और जिसे हम सुबह कहते हैं, वह रात का अंत है और दिन का प्रारंभ है। और इस जगत में कुछ भी पूर्ण अंत को नहीं पहु
ंचाता। इस जगत में कुछ भी पहला प्रारंभ नहीं है। कोई चीज कहीं जाकर न समाप्त होती है और न कहीं शुरू होती है।

इसलिए जीवन अनंत है। लेकिन मरने का डर बेहोश कर देता है। और इस डर के कारण हम समाधि में कभी प्रवेश नहीं कर पाते। कितने लोग हैं जो मुझसे कहते हैं, ‘कल ही एक मित्र कहते थे ‘आप ध्यान की बात तो कहते हैं, लेकिन अभी समझ में नहीं आती, उतर भी नहीं पाते।’ नहीं उतर पाएंगे। जब तक मन की बहुत गहराई में मरने की तैयारी न हो, तब तक समाधि में नहीं उतरा जा सकता है। लेकिन जो लोग ध्यान करने आते हैं, वे इसीलिए आते हैं कि शायद ध्यान भी मरने से बचने की एक तरकीब बन जाए। वे यह सोचते हैं कि शायद ध्यान द्वारा, आत्मा अमर है, ऐसा पता चल जाए। चलेगा पता। लेकिन उसी को जो मरने के लिए तैयार है। ध्यान से पता चलेगा कि आत्मा अमर है लेकिन उसे नहीं जो सिर्फ आत्मा की अमरता का पता लगाने आया है, बल्कि उसे जो मरने के लिए तैयार है। मरने की तैयारी ही उसे उस जगह पहुंचा देती है, जहां न मरने का पता चलता है। हम मृत्यु के बोध को हटाए रहते हैं। हमने मरघट गांव के बाहर बनाए हैं, इसीलिए कि वह रोज-रोज दिखाई न पड़े। होना तो चाहिए गांव के बीच में मरघट। जहां से हर आदमी निकले, दिन में दो-चार बार तो उसे मृत्यु का खयाल आ जाए। मैं एक गांव में गया था, वे बड़े होशियार लोग हैं। उन्होंने बहुत अच्छी तरह से मरघट बनाया है, ऐसा कि वहां जाकर भी आपको मरघट का पता न चले। वहां भी उन्होंने बगीचे लगाए हैं, लाइब्रेरी बना दी है कि वहां जो लाग जाते हैं वे अखबार वहां भी पढ़ते रहते हैं। मौन को छोड़ कर, वह मौत को छोड़ देते हैं। और सदा एक खयाल बनाए रखते हैं कि सदा कोई और मरता है, मैं कभी नहीं मरता हूं! दूसरे मरते हैं। और जब दस-पांच आदमियों को कोई आदमी मरघट पहुंचा आता है, तो और आश्वस्त हो जाता है कि मैं कैसे मरूंगा! मैं तो दूसरों को पहुंचाने का काम करता हूं। मैंने न मालूम कितने लोगों को पहुंचा दिया, अब मुझे कौन पहुंचाएगा !

आभार : - आ॓शो इंटरनेशनल फाउंडेशन ... !
 

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