Friday, 31 August 2012

योग शब्द का अर्थ 'जोड़' है॥ परमपिता परमात्मा की स्मृति द्वारा आपना सम्बन्ध परमात्मा के साथ जोड़ना ही 'योग' है॥ अतः निष्काम भाव से कर्म किये जाना ही 'कर्मयोग' नहीं है बल्कि "कर्म करते हुए परमपिता परमात्मा की स्मृति को धारण किये रहना ही कर्म-योग का अभ्यास करना है॥" कर्म तो सभी करते हैं परन्तु साथ-साथ 'योग' नहीं करते॥ क्योंकि कर्म-भोगी की बुद्धि तो सारा दि
न इस संसार के विषय-भोगों में भटकती है॥ अतः कर्म करते हुए बुद्धि को इधर-उधर लगाने की बजाय परमपिता परमात्मा की स्मृति में लगाये रखना ही कर्म-योगी बनना है॥

कर्म-योगी बनने का अर्थ निष्काम कर्म करना नहीं है, क्योंकि प्रत्येक कर्म के पीछे, मनुष्य के मन में कोई-न-कोई कामना तो रहती ही है; हाँ वह कामना शुभ अथवा अशुभ हो सकती है॥ योगी के मन में परमात्मा की स्मृति के आनन्द की कामना अथवा विकर्मों को दग्ध करने की कामना अथवा मुक्ति या जीवनमुक्ति पाने की शुद्ध कामना तो होती ही है॥ इसी प्रकार, भोगी के मन में विषय-वासनाओं को भोगने की अशुद्ध कामना होती है॥ कामना के बिना मनुष्य भोगी जीवन को छोड़ कर योगी भी नहीं बन सकता॥ अतः कर्म-योगी भी कामना-रहित नहीं होता॥ परन्तु उसकी कामना विषय-वासनाओं को भोगने की कामना नहीं होती बल्कि आत्मिक सुख प्राप्त करने तथा समाज सेवा करने की शुभ कामना होती है॥ वह सुभ कर्मों को आपना कर्तव्य समझ कर करता चलता है; परन्तु इस बात का ध्यान रखता है की मन की लगन परमात्मा से लगी रहे क्योंकि वह जानता है की देह के सभी सम्बन्ध तो विनाशी हैं; आत्मा के अविनाशी सम्बन्ध तो परमात्मा से ही हैं, जिससे ही प्रीति जोड़नी है॥ 

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