Wednesday, 11 July 2012

 'आत्मा'  


संसार में बहुत-से लोग ऐसे हैं जिनका लक्ष्य खाना, पीना और मौज उड़ाना ही हैं॥ वे शरीर से अलग 'आत्मा' नाम की शाश्वत सत्ता को नहीं मानते॥ वे पुनर्जन्म और कर्म के अटल सिद्धान्त में भी आस्था नहीं रखते॥ उनका मत है की जब तक यह शरीर है तब तक ही सब कुछ है॥ अतः उनका लक्ष्य भी येहीं तक सीमित रहता है और उसमें लक्ष्य भी तदनुसार ही होते हैं॥ कोई अभिनेता बनना चाहता है तो उसका क्रिया-कलाप, हावभाव, वार्तालाप उसी प्रकार ही होने लगता हैं॥ कोई सेठ बनना चाहता है तो उसकी बुद्धि उसी और चलने लगती है॥ वास्तव में देखा जाये तो यह सब जीविकोपार्जन के साधन हैं और ये लक्ष्य जीवन के अन्तिम लक्ष्य नहीं हैं॥ मनुष्य से देवता बनना, सद्गुणों का विकास करना, चारित्रिक रूप से महान बनना ही मनुष्य का ध्येय होना चाहिए॥ इस ध्येय के फलस्वरूप मनुष्य को यह ध्यान रहेगा की मुझे अच्छे कर्म करने हैं॥ इस लक्ष्य से उसमें दैवी लक्षण आयेंगे और उसका चरित्र महान होगा॥ 

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