Saturday, 28 September 2013

ग़ैरों कि जहाँ ---

चलो फिर से अजनबी बन जाते हैं , हम एक दूजे से ,
क्योंकि ... बिक चुकी है इंसानियत इस जहाँ के बाज़ार में |

जीवन के इस निर्मम पथ पर
, जहाँ वक़्त का कोई ठिकाना नहीं ,
वहाँ अनजाने सवालों का पता हम अजनबियों से पूछते हैं |

कदम के साथ कदम मिलाने की
, कोशिश कि इस जहाँ में ,
वक़्त आने पर दुआएँ , तो मिलती है मगर दवा नहीं मिलती |

राहें तो मिलती है कई , इस ग़ैरों कि जहाँ में , लेकिन
ग़ैरों में अपने की तलाश में , यहाँ मंज़िल नहीं मिलती | - लिली कर्मकार

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