Sunday, 2 September 2012



न जाने सरहदों की दिवार पर . . .

इंसान इतना नाज क्यों करते है . . . ?

न जाने कहाँ खो गयी . . .

‘ वो इंसानियत ’ . . . !

न जाने कहाँ खो गयी . . .

‘ वो मासूमियत ’ . . . !


यह तो ईंट पत्थरों का सरहदें है . . .

पत्थरों पर क्यों माथा ठोकना . . . !

मजहब कभी नहीं सिखाता है . . . ;

आपस मै वैर करना और . . .

बेगुनाहों का खून बहाना . . . ! -लिलि कर्मकार
 

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