Friday, 31 August 2012

स्व-स्थिति : - इससे हमारा अभिप्राय वक्ता की अपनी मानसिक अवस्था से है ॥ जब कोई व्यक्ति अन्य किसी के कार्य की आलोचना करता है तो पहली विचारणीय बात यह है की उसकी अपनी मनोस्थिति कैसी है ? प्राय: देखा गया है की दूसरे की कटु आलोचना करने वाले के मन में 'अहंकार' होता है ॥ वह स्वयं को दूसरों से अधिक कुशल, अधिक बुद्धिमान ओर अधिक समझदार मानता है ॥ उसी नशे में ही वह अभद्र र
ीति से दूसरों की ग्लानि करता है ॥ भले ही वह जो बात कह रहा हो वो सत्य हो परन्तु उस सत्य को अहंकार पुट दी हुई होती है ॥ साथ-साथ यह भी देखा गया है की उसके मन में ईर्षा भी होती है ॥ जब वो देखता है की अन्य लोग एक व्यक्ति की प्रसंसा किया करते हैं तो उससे यह सहन नहीं हो सकता ॥ अतः डाह के वशीभूत होकर वह उसकी त्रुटिया बताने लगता है ॥

हमेसा दूसरों की त्रुटिया निकालना या फिर दूसरों की निन्दा करना यह भी एक बीमारी है ॥ यह बीमारी हर परिवेश को विषाक्त कर देते है ओर तामसिक लहर (Vibration) फैलता है ॥ 

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