Tuesday, 6 November 2012


हे मानव, तुम तो विश्वास के काबिल थे ...  
अचानक ऐसा क्या हुआ की …  
तुम्हारे ऊपर आज विश्वास करने में  
इतनी हिचकिचाहट हो रही है ... !!

 हे मानव, कभी एक ऐसा भी पल था …
जब तुमने ही मेरे मन को सुकून दिया था ...  
फिर आज क्या हुआ की वही तुम्हारी यादें …
मुझे काटने को दौड़ रहीं है … !

क्यों तुम मुझसे भाग रहे हो और  
क्यों मैं तुम्हारी यादों से भाग रही हूँ … !  
जहां तक मुझे याद है …
हमारा रिश्ता तो आपसी विश्वास के ऊपर कायम था ... !   

हे मानव, दुनिया बदल चुकी है  
साथ में तुम भी बदल चुके हो ... !  
कहां गया वो साथ निभाने का वादा और ...
तुम्हारी वो निःस्वार्थ भावनाएँ ... ?  
आज की इस भागती दौड़ती दुनिया में क्या ...
मेरा वजूद तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं रखता  ... ? – लिली कर्मकार 

1 comment:

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