Friday, 31 August 2012

धुंधला आसमान , एकान्त सड़क मे 
वो अकेले अकेले बैठा है ; 
रंगीन कोई ‘ सपना ‘ बुनने के लिए ॥ 

वो ‘ सपने भरे आँखों ‘ से ,
धुंधले आसमान की ओर
देखता रहता है .......
कभी तो ‘ सूरज ‘ की नई किरण
दिखाई पड़ेगी ...... जो नयी
जीवन जीने की ‘ राह ‘ दिखाएगी !!!!

उसकी मन की ‘ गीत ‘ बादलों को हटाकर
सूरज को छूने की कौशिश करते है .....

उसकी मन की ‘ रंगीन तुली ’ से छूने पड़
बादल भी कही ‘ छुप ‘ जाते है .....
कोई क्या समझ भी पाते है ????
उसकी मन की ‘ रंगीन सपनों ‘ को ......! - लिलि कर्मकार

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